Saturday, 6 February 2016

जल है तो जीवन है

जल है तो जीवन है
घट-घट पर्वत के ह्रदय से, कलरव बहती निर्मल धारा,
शिशिर, ग्रीष्म,बसंत, हेमंत, हर ऋतु सुनाती अनुराग निराला |
उपनिषद, पुराणों में वार्णित है, जल जीवन ही उजियारा,
घट-घट पर्वत के ह्रदय से, कलरव बहती निर्मल धारा ||

लता, पौधे, वृक्ष पनपते इससे, बरसे तो अमृत ये बन जाता,
तन का मैला, मन का मैला, पल में सबको स्वच्छ बनाता |
तृष्णा से व्याकुल हो मानुष, या हो चिंतित कृषक बेचारा,
हर्षित हो जाते हैं सारे, मिल जाय तो जल- धारा ||

झरना बनकर मन मोह लेता, मुकुट ये पर्वत का कहलाता,
सरिता बनकर सींचे धरती, पूजे इसको अन्नदाता |
कण-कण, पग-पग जल ही जल है, दरिया से सागर सारा,
श्रृंगार धरा का जल से ही है, जल ही है जीवन धारा ||

जनम से मरण तक इसका, प्राणी-प्राणी से अदभुत नाता,
कहीं बाढ़ त्रस्त है कोई, कहीं बिन इसके भूतल सारा तप जाता |
कहीं बरसता बेसुध होकर, कहीं कोई इसको तरस जाता,
जीवन का ये काल चक्र है, बिन जल यह ना चल पाता ||

जल को बचाना-जीवन बचाना, हो अब यह दृढ़ संकल्प हमारा,
व्यर्थ ना जाय बूँद एक भी, हो जाय जीवन समर्पित सारा |
जल है तो ही कल है, हो अब यह स्वाभिमान हमारा,
व्यर्थ ना जाय बूँद एक भी, हो जाय जीवन समर्पित सारा ||

उपनिषद, पुराणों में वार्णित है, जल जीवन ही उजियारा,
घट-घट पर्वत के ह्रदय से, कलरव बहती निर्मल धारा ||

  

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